दुर्ग। लगातार घटती वर्षा, भू-जल स्तर में गिरावट तथा बढ़ती हुई सिंचाई लागत जैसी चुनौतियों के बीच कृषि को टिकाऊ एवं लाभकारी बनाने हेतु शासन द्वारा पहल की जा रही है। कृषि विभाग द्वारा ग्रीष्मकालीन धान फसल को हतोत्साहित करते हुए कृषकों को दलहन, तिलहन एवं अन्य फसल लेने हेतु प्रेरित किया जा रहा है। कृषि विभाग एवं जिला प्रशासन के सतत् प्रयासों से दुर्ग संभाग में 33,010 हेक्टेयर ग्रीष्मकालीन धान के रकबे को प्रतिस्थापित करते हुए धान के स्थान पर वैकल्पिक फसल के रूप में 12,491 हेक्टेयर में दलहन, 3,532 हेक्टेयर में तिलहन, 3,106 हेक्टेयर में मक्का, 410 हेक्टेयर में लघु धान्य तथा 13,472 हेक्टेयर में अन्य फसल लिये जाने की जानकारी संयुक्त संचालक कृषि श्रीमती गोपिका गबेल द्वारा संभागीय आयुक्त दुर्ग को समीक्षा बैठक में दी गई। इस रकबे में और वृद्धि की संभावना है। संभागीय आयुक्त दुर्ग द्वारा प्रतिस्थापित रकबे को गिरदावरी में अनिवार्य रूप से शामिल करने के निर्देश दिये गये।अनियमित वर्षा, जल संरक्षण की कमी एवं भू-जल के अधिक दोहन होने के कारण ग्रीष्मकाल में राज्य के कई जिलों में पेयजल संकट एवं निस्तारी के पानी की समस्या हो जाती है। दिनों-दिन भू-जल स्तर में गिरावट भी दर्ज की जा रही है। केन्द्रीय भू-जल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार दुर्ग संभाग के राजनांदगांव एवं बेमेतरा जिले को क्रिटिकल जोन में रखा गया है। कृषि विभाग एवं जिला प्रशासन के द्वारा विशेष अभियान चलाकर इस वर्ष जिला बेमेतरा में 20,231 हेक्टेयर एवं राजनांदगांव में 6,335 हेक्टेयर में ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर वैकल्पिक फसल ली गयी है।ग्रीष्मकालीन धान की जल आवश्यकता दलहन, तिलहन, मक्का की अपेक्षा दो से तीन गुना अधिक होती है। इसी उपलब्ध सिंचाई जल से धान के स्थान पर दलहन, तिलहन, मक्का की फसल दो से तीन गुना अधिक क्षेत्र में ली जा सकती है। औसतन 1 कि.ग्रा. धान उत्पादन के लिए 2 से 3 हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जिसकी पूर्ति मुख्य रूप से भूमिगत जल स्त्रोतों से की जाती है। वृहद क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन धान लगाने से हैण्डपंप एवं ट्यूबवेल सूख जाते है, पीने के पानी की किल्लत होती है। पर्यावरणीय असंतुलन के साथ भूमि की उपजाऊ शक्ति में कमी आती है। वैज्ञानिक अनुसंधान के अनुसार ग्रीष्मकालीन धान के पश्चात खरीफ में पुनः धान की खेती से कीट व्याधि की संभावना बढ़ जाती है। अतः कृषि विभाग एवं जिला प्रशासन द्वारा कृषकों को निरंतर ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर अन्य फसल लेने हेतु प्रोत्साहित किया जा रहा है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के अनुसार ग्रीष्मकालीन धान से प्रति हेक्टेयर लगभग 40,000 रूपये की शुद्ध आय होती है, जबकि वैकल्पिक फसलों से इससे अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। किसान भाई दलहनी-तिलहनी व अन्य फसलों से प्रति हेक्टेयर जैसे रागी-72,720 मक्का-1,14,000 सूरजमुखी-1,08,978 तिल-43,922 मूंग-80,216 मूंगफली-92,997 रूपये की आमदनी प्राप्त कर सकते है।
दुर्ग संभाग में ग्रीष्मकालीन धान के 33 हजार हेक्टेयर से अधिक रकबे में कमी

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